Sunday, December 26, 2010

मै तो बस सूखा सावन हूँ

मै तो बस सूखा सावन हूँ
ना मुरली की तान न राधा ,एसा सूना बृन्दावन हूँ
एक सुंदरी मधुबाला का ,पल पल कर ढलता योवन हूँ
बूँद बूँद आँखों से बहता ,गंगा जमना का संगम हूँ
अपनों का बेगाना पन या सास बहू वाली अनबन हूँ
कृष्ण पक्ष का घटता शशि हूँ या फिर जैसे चन्द्र ग्रहण हूँ
सीखा जहाँ सभी ने चलना ,मै पुरखों का वो आँगन हूँ
आज रक्त में जा घुल बैठा,बातों का वो मीठापन हूँ
गो मुख में जा दुग्ध बनेगा,मै तो एसा सूखा तृण हूँ
भट्टी में तप गया समय की ,तब जाकर निखरा कुंदन हूँ
विस्तृत ज्ञान हो गया विस्मृत ,शेष बचा वो पागलपन हूँ
थका थका सा मेरा तन है ,मै तो बुझा बुझा सा मन हूँ
मै तो बस सूखा सावन हूँ
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