Friday, September 20, 2013

          भूल और भूलना

जन्म देकर तुम्हारा पोषण किया ,
और बनाया वक़्त के अनुकूल है
आज क्यों  तुमने भुलाया है उन्हें,
भूलना उनको तुम्हारी भूल है
सच्चे दिल से प्यार करते है तुम्हे ,
भूल कर माँ बाप को मत भूलना
सूर्य उगता ,चमकता,ढलता भी है,
याद रख,इस बात को मत भूलना
बालपन के पल सुहाने,भोलापन,
भूलना मत ,प्रेमिका के प्यार को
भूल जाना तुम किसी की भूल को,
भूलना मत ,किसी के उपकार को
 दुश्मनी कोई करे तो भुला दो,
भूलना मत दोस्ती का नजरिया
मत भुलाना किसी के अहसान को ,
भूल जाना तुम सभी की गलतियां
भूल जाओ ,अपने सारे गमो को,
कभी खुशियाँ,कभी गम,जीवन यही
ख्याल  पल पल जो तुम्हारा रख रहा ,
उस प्रभू को भूलना किंचित  नहीं
याद रखना गलतियां ,जिनने कभी,
सफलता का पथ प्रदर्शित था किया
दूसरों के  दोष  ढूंढो  बाद में ,
पहले देखो खुद में है क्या खामियां
जवानी के जोश में मत भूलना ,
कल बुढ़ापा भी तुम्हे  तडफायेगा
चार दिन की चांदनी है जिन्दगी ,
क्या पता कब मौत का पल आयेगा
भूलना आदर्श मत,उत्कर्ष हित,
किया जो संघर्ष को मत भूलना
मातृभूमी स्वर्ग से भी बढ़ के है,
अपने भारत वर्ष को मत भूलना

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Thursday, September 19, 2013

                 गलती हमी से हो गयी

        आपने जो भी लिखा सब ठीक था ,

          पढने में गलती हमी से हो गयी

बीज बोये और सींचे प्यार से,

चाहते थे ये चमन,गुलजार हो

पुष्प विकसे ,वृक्ष हो फल से लदे,

हर तरफ केवल महकता प्यार हो

          वृक्ष लेकिन कुछ कँटीले उग गये ,

           क्या कोई गलती जमीं से हो गयी

पालने में पूत के पग दिखे थे ,

मोह का मन पर मगर पर्दा पड़ा

उसी पग से लात मारेगा हमें ,

और तिरस्कृत करेगा होकर बड़ा

            पकड़ उंगली ,उसे चलना ,पग उठा,

             सिखाया ,गलती हमी से हो गयी

हमने तो बोये थे दाने पोस्त के,

फसल का रस मगर मादक हो गया

गुरूजी ने तो सिखाया योग था,

भोग में पर लिप्त साधक हो गया

               किस पे अब हम दोष आरोपित करें,

                कमी, कुछ ना कुछ, कहीं से हो गयी 

देख कर हालात  सूखी  धरा के ,

हमने माँगी थी दुआ  बरसात की

जल बरस कर मचा देगा तबाही ,

कल्पना भी नहीं थी इस बात की

                खफा था या मेहरबां था वो खुदा
                
                या खता फिर आदमी से हो गयी

                आपने जो लिखा था ,सब सही था,

                पढने में गलती हमीं से हो गयी  

मदन मोहन बाहेती'घोटू'  

Monday, September 16, 2013

        दर्द अपना किसे बांटे

बढ़ रही दिन ब दिन मुश्किल .दर्द अपना किसे बांटे
किस तरह से दिन गुजारें,किस तरह से रात काटें
उम्र की इन सीढ़ियों पर चढ़ बहुत इतरा रहे थे
जहाँ रुकते ,यही लगता ,लक्ष्य अपना पा रहे थे
किन्तु अब इस ऊंचाई पर ,शून्य सब कुछ नज़र आता
किस तरह के खेल हमसे ,खेलता है ,ये विधाता
कभी सहला प्यार करता ,मारता है कभी चांटे
किस तरह से दिन गुजारें,किस तरह से रात काटें
धूप देकर जो लुभाता ,सूर्य गोला आग का है           
चाँद देता चाँदनी पर पुंज केवल राख का है
टिमटिमा कर मोहते मन ,दूर मीलों वो सितारे
सच कहा है ,दूर के पर्वत सभी को लगे प्यारे
बहुत मुश्किल,स्वर्ग का पथ ,हर जगह है ,बिछे कांटे
किस तरह से दिन गुजारें,किस तरह से रात काटें
लोभ में जीवन गुजारा ,क्षोभ में अब जी रहे है
सुधा हित था किया मंथन,पर गरल अब पी रहे है
जिन्हें अपना समझते थे ,कर लिया सबने किनारा 
डूबते को राम का ही नाम  है अंतिम सहारा
किस तरह हम ,पार भवसागर करेंगे ,छटपटाते
किस तरह हम दिन गुजारें,किस तरह से रात काटें

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Wednesday, September 11, 2013

    दिनचर्या - बुढ़ापे की

रात बिस्तर पर पड़े ,जागे सुबह,
                      सिलसिला अब ये रोजाना हो गया है
आती है,आ आ के जाती है  चली ,
                       नींद का यूं  आना  जाना  हो गया  है
     हो गए कुछ इस  तरह हालात है
                            मुश्किलों से कटा करती रात  है
 देखते ही रहते ,टाइम क्या हुआ ,   
                             चैन से सोये  ज़माना हो गया है   
आती ही रहती पुरानी याद है,
                               कभी खांसी तो कभी पेशाब है ,
कभी इस करवट तो उस करवट कभी,
                                 रात भर यूं तडफडाना हो गया है
सुबह उठ कर चहलकदमी कुछ करी ,
                                 फिर लिया अखबार ,ख़बरें सब पढ़ी ,
बैठे ,लेटे , टी .वी देखा बस यूं ही,
                                 अब तो मुश्किल ,दिन बिताना हो गया है

मदन मोहन बाहेती'घोटू '

Tuesday, September 3, 2013

            बुढापे की झपकियाँ

बचपन में ऊंघा करते थे जब हम क्लास में,
टीचर जगाता था हमें तब चाक  मार  कर
यौवन में  कभी दफ्तरों में  आती झपकियाँ ,
देता था उड़ा नींद ,बॉस ,डाट  मार कर
लेकिन बुढ़ापा आया,जबसे रिटायर हुए ,
रहते है बैठे घर में कभी ऊंघते है हम,
कहती है बीबी ,लगता है डीयर तुम थक गए,
कह कर के सुलाती हमें ,वो हमसे प्यार कर

घोटू

Thursday, August 29, 2013

               है डालरों से हम

बचपन से जवानी  तलक ,पाबंदी थी लगी ,
                ना स्कूलों में ऊँघे और ना दफ्तरों में हम
पर जबसे आया बुढ़ापा ,हम रिटायर हुए,
                 जी भर के ऊंघा  करते है ,अपने घरों में हम
बीबी को मगर इस तरह  ,आलस में ऊंघना ,
                  बिलकुल नहीं पसंद है ,रहती  है डाटती ,
कहती है दिन में सोने से  ,जगते है  रात को,
                    सोने न देते ,सताते,है बिस्तरों में  हम
अब ये ज़माना आ गया ,घर के घाट के,
                     अंकल जी कहके लड़कियां ना घास डालती,
कितने ही रंग लें बाल  और हम फेशियल  करें,
                      उड़ने का जोश ला नहीं ,सकते परों में हम
टी वी से या अखबार से अब कटता वक़्त है,
                        घर का कोई भी मेंबर ,हमको न पूछता ,
पावों को छुलाने की बन के चीज रह गए,
                         त्यौहार,शादी ब्याह के ,अब अवसरों में हम
हम दस के थे,डालर की भी ,कीमत थी दस रूपये ,
                          छांछट का है डालर हुआ ,छांछट के हुए हम,
फिर भी  हमारे बच्चे है  ,इतना न समझते ,
                             होते ही जाते कीमती, है डालरों से  हम

मदन मोहन बाहेती'घोटू;  

Sunday, August 25, 2013

जवानी सलामत- बुढ़ापा कोसों दूर है

हम तो है ,कोल्ड स्टोरेज में रखे आलू ,
जब भी जरुरत पड़े,लो काम में,हम ताज़े है
ज़रा सी फूंक जो मारोगे ,लगेगे बजने ,
हम तो है बांसुरी ,या बिगुल,बेन्ड बाजे है
पुरानी चीज को रखते संभाल कर हम है ,
चीज 'एंटिक 'जितनी,उतना दाम बढ़ता है
बीबियाँ वैसे कभी पुरानी नहीं पड़ती ,
ज्यों ज्यों बढ़ती है उमर ,वैसे  प्यार बढ़ता है
वैसे भी दिल हमारा एक रेफ्रिजेटर  है ,
उसमे जो चीज रखी ,सदा फ्रेश  रहती है
हमारी बीबी सदा दिल में हमारे रहती ,
प्यार में ताजगी जो हो तो ऐश रहती  है
समय के साथ,जब बढ़ती है  उमर तो अक्सर,
लोग जाने क्यों ,खुद को बूढा समझने लगते
आदमी सोचता है जैसा,वैसा हो जाता ,
सोच कर बूढा खुद को बूढ़े  वो लगने लगते
सोच में अपने न आने दो उमर का साया,
जब तलक ज़िंदा हो तुम और जिंदगानी है
जब तलक है जवान मन और सोच तुम्हारा,
समझ लो ,तब तलक ही ,सलामत जवानी है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'