Sunday, March 25, 2012

हो गयी माँ डोकरी है

हो गयी माँ डोकरी है

प्यार का सागर  लबालब,अनुभव से वो भरी है

हो गयी माँ डोकरी है
नौ दशक निज जिंदगी के,कर लिए है पार उनने
सभी अपनों और परायों ,पर लुटाया  प्यार  उनने
सात थे हम बहन भाई,रखा माँ ने ख्याल सबका
रोजमर्रा जिंदगी के ,काम सब और ध्यान घर का
कभी दादी की बिमारी,पिताजी की व्यस्तायें
सभी कुछ माँ ने संभाला,बिना मुंह पर शिकन लाये
और जब त्योंहार आते,तीज,सावन के सिंझारे
सभी को मेहंदी लगाती,बनाती पकवान सारे
दिवाली  पर काम करती,जोश दुगुना ,तन भरे वो
सफाई,घर की पुताई,मांडती थी,मांडने  वो
और हम सब बहन भाई,पढाई में व्यस्त रहते
मगर सब का ख्याल रखती,भले थक कर पस्त रहते
गयी निज ससुराल बहने,भाइयों की नौकरी है
साथ बाबूजी नहीं है, हो गयी माँ डोकरी     है
भूख  भी कम हो गयी है,बिमारी है,क्षीण तन है
चाहती सब काम करना,मगर आ जाती थकन है
और जब त्योंहार आते,उन्हें आता जोश भर है
सभी रीती रिवाजों पर ,आज भी पूरा दखल है
ये करो, ऐसे करो मत,हमारी है  रीत ऐसी
पारिवारिक रिवाजों को ,निभाने की प्रीत ऐसी
फोन करके,बहू बेटी को आशीषें बांटती   है
कभी गीता भागवत सुन ,वक़्त अपना काटती है
भले ही धुंधलाई आँखें, मगर यादों से भरी  है
हो गयी माँ डोकरी  है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Saturday, March 24, 2012

हमारा आज-तुम्हारा कल

             हमारा आज-तुम्हारा कल
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ये न समझो ,यूं ही हमने ,काट दी अपनी उमर है
भीग करके ,बारिशों में,अनुभव की हुए तर  है
आज तुम जिस जगह पर हो,क्या कभी तुमने विचारा
तुम्हारी इस प्रगति में,सहयोग है कितना   हमारा
तुम्हारे सुख ,दुःख ,सभी पर,आज भी रखते नज़र है
हमारा मन मुदित होता,तुम्हे बढ़ता देख कर है
प्यार तुम से कल किया था,प्यार तुमसे आज भी है
देख तुम्हारी तरक्की,हमें तुम पर नाज़ भी है
हमें है ना गिला कोई,आ गया बदलाव तुम मे
बदलना नियम प्रकृति का,क्यों रखें हम क्षोभ मन में
भाग्य का लेखा सभी को,भुगतना है,ख्याल रखना
आज हम को जो खिलाते,पड़ेगा कल तुम्हे  चखना

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Sunday, March 11, 2012

कष्ट-बुढ़ापे का

कष्ट-बुढ़ापे का
उम्र के इस  दौर ने ये हमारी हालत बनाइ 
काम हम कुछ भी करें तो हमें है इसकी मनाही
बढ़ रहा है ब्लड प्रेशर,घूमना फिरना  मना है
बैठ कर कमरे में हमको,सिर्फ टी वी देखना है
सुन के बच्चे बिगड़तें है,मत सुनो आईटम गाने
बड़े  अच्छे मधुर होते ,पुराने गाने,सुहाने
बुढ़ापे में इस कदर है,हमें बच्चे प्यार करते
डाईबिटिज है हमें,वो नहीं  मीठी बात करते
पूजते माँ बाप को है,एक कोने में बिठाके
पथ्य है पकवान,रहना दाल रोटी सिर्फ खाके
सामने पकवान  खाता,बैठ घर का हर जना है
हमें मिलती खीचड़ी है,तली सब चीजें मना  है 
नहीं आइसक्रीम खाओ,तुम्हे हो जायेगी खांसी
नहीं चखने हमें देते मिठाई ,थोड़ी जरा  सी
प्यार से हम पर लगाये गए सब प्रतिबन्ध से है
आजकल घर में घुसे हम,जेल में ज्यों बंद  से  है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Saturday, March 10, 2012

तुम बदली पर प्यार न बदला

तुम बदली पर प्यार न बदला

घटाओं से बाल काले आज  श्वेताम्बर  हुए  है

गाल चिकने गुलाबी पर झुर्रियां,सल पड़ गए है
हिरणी से नयन तुम्हारे, कभी  बिजली गिराते
चमक  धुंधली पड़ी ऐसी,छुप रहे ,चश्मा चढाते
और ये गर्दन तुम्हारी,जो कभी थी मोरनी सी
आक्रमण से उम्र के अब ,हुई द्विमांसल घनी सी
मोतियों सी दन्त लड़ी के,टूट कुछ मोती गये है
क्षीरसर में खिले थे जो वो कमल  कुम्हला गये है
कमर जो कमनीय सी थी,बन गयी है आज कमरा
पेट भी अब फूल कर के,लटकता है बना  दोहरा
पैर  थे स्तम्भ कदली के हुए अब हस्ती पग है
अब मटकती चाल का,अंदाज भी थोडा अलग है
शरबती काया तुम्हारी,सलवती अब हो गयी है
प्यार का लेकिन खजाना,लबालब वो का वही है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Sunday, February 19, 2012

अरे ओ औलाद वालों!

अरे ओ औलाद वालों!
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अरे ओ औलाद वालों,
बुजुर्गों को मत प्रताड़ो
आएगा तुम पर बुढ़ापा,
जरा इतना तो विचारो
जिन्होंने अपना सभी कुछ,तुम्हारे खातिर लुटाया
तुम्हारा जीवन संवारा,रहे भूखे,खुद न खाया
तुम्हारी हर एक पीड़ा पर हुआ था दर्द जिनको
आज कर उनकी उपेक्षा,दे रहे क्यों पीड़ उनको
बसे तुम जिनके ह्रदय में,
उन्हें मत घर से निकालो
अरे ओ औलाद वालों !
समय का ये चक्र ऐसा,घूम कर आता वहीँ है
जो करोगे बड़ो के संग,आप संग होना वही है
सूर्य के ही ताप से जल,वाष्प बन,बादल बना है
ढक रहा है सूर्य को ही,गर्व से इतना तना  है
बरस कर फिर जल बनोगे,
गर्व को अपने संहारो
अरे ओ औलाद वालों!
बाल मन कोमल न जाने,क्या गलत है,क्या सही है
देखता जो बड़े करते,बाद में करता वही  है
इस तरह संस्कार पोषित कर रहे तुम बालमन के
बीज खुद ही बो रहे,अपने बुढ़ापे  की घुटन के
क्या गलत है,क्या सही है,
जरा अपना मन खंगालो
अरे ओ औलाद वालों!

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Tuesday, February 7, 2012

घुटने की तकलीफ

घुटने की  तकलीफ
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होती हमें बुढ़ापे में है ,घुटने की तकलीफ बहुत है
बचपन में चलते घुटनों  बल,चलना तभी सीख पाते है
मानव के जीवन में घुटने,सबसे अधिक काम आते है
करो प्रणाम,झुकाव घुटने,प्रभु पूजन में घुटने टेको
दफ्तर में साहब के आगे,झुकना पड़ता है घुटने को
बैठो तो घुटने बल बैठो,लेटो,करवट लो, घुटने बल
योगासन में,भागदौड़ में,घुटने ही देते है संबल
जगन,शयन और मधुर मिलन में,घुटने का सहयोग बहुत है
सीढ़ी चढ़ने  और उतरने   में घुटनो  का  योग बहुत  है
पत्नी जी यदि जिद पर आये,उनके आगे टेको  घुटने
हम इतना झुकते जीवन भर,की घुटने लगते है दुखने
इस शरीर का सारा बोझा,बेचारे घुटने सहते है
कदम कदम पर ,घुटनों के बल,हम आगे बढ़ते रहते है
एक  तो उमर बुढ़ापे की और उस पर ये घुटने की पीड़ा
उस पर बच्चे ध्यान न देते,मन ही मन घुटने की पीड़ा
मन की घुटन,दर्द घुटने का,तन मन रहती पीड़ बहुत है
होती हमें बुढ़ापे में है,घुटने की तकलीफ बहुत है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Friday, January 27, 2012

बूढों का हो कैसा बसंत

बूढों का हो कैसा बसंत?
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पीला रंग सरसों फूल गयी
मधु देना अब ऋतू भूल गयी
सब इच्छाएं प्रतिकूल गयी
        यौवन का जैसे हुआ अंत
        बूढों का हो कैसा बसंत
गलबाहें क्या हो,झुकी कमर
चल चितवन, धुंधली हुई नज़र
क्या रस विलास अब गयी उमर
         लग गया सभी पर प्रतिबन्ध
          बूढों का हो कैसा बसंत
था चहक रहा जो भरा नीड़
संग छोड़ गए सब,बसी पीड़
धुंधली यादें,मन है अधीर
          है सभी समस्यायें दुरंत
          बूढों का हो कैसा बसंत
मन यौवन सा मदहोश नहीं
बिजली भर दे वो जोश नहीं
संयम है पर संतोष नहीं
        मन है मलंग,तन हुआ संत
         बूढों का हो कैसा बसंत

मदन मोहन बाहेती'घोटू'