Saturday, March 10, 2012

तुम बदली पर प्यार न बदला

तुम बदली पर प्यार न बदला

घटाओं से बाल काले आज  श्वेताम्बर  हुए  है

गाल चिकने गुलाबी पर झुर्रियां,सल पड़ गए है
हिरणी से नयन तुम्हारे, कभी  बिजली गिराते
चमक  धुंधली पड़ी ऐसी,छुप रहे ,चश्मा चढाते
और ये गर्दन तुम्हारी,जो कभी थी मोरनी सी
आक्रमण से उम्र के अब ,हुई द्विमांसल घनी सी
मोतियों सी दन्त लड़ी के,टूट कुछ मोती गये है
क्षीरसर में खिले थे जो वो कमल  कुम्हला गये है
कमर जो कमनीय सी थी,बन गयी है आज कमरा
पेट भी अब फूल कर के,लटकता है बना  दोहरा
पैर  थे स्तम्भ कदली के हुए अब हस्ती पग है
अब मटकती चाल का,अंदाज भी थोडा अलग है
शरबती काया तुम्हारी,सलवती अब हो गयी है
प्यार का लेकिन खजाना,लबालब वो का वही है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Sunday, February 19, 2012

अरे ओ औलाद वालों!

अरे ओ औलाद वालों!
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अरे ओ औलाद वालों,
बुजुर्गों को मत प्रताड़ो
आएगा तुम पर बुढ़ापा,
जरा इतना तो विचारो
जिन्होंने अपना सभी कुछ,तुम्हारे खातिर लुटाया
तुम्हारा जीवन संवारा,रहे भूखे,खुद न खाया
तुम्हारी हर एक पीड़ा पर हुआ था दर्द जिनको
आज कर उनकी उपेक्षा,दे रहे क्यों पीड़ उनको
बसे तुम जिनके ह्रदय में,
उन्हें मत घर से निकालो
अरे ओ औलाद वालों !
समय का ये चक्र ऐसा,घूम कर आता वहीँ है
जो करोगे बड़ो के संग,आप संग होना वही है
सूर्य के ही ताप से जल,वाष्प बन,बादल बना है
ढक रहा है सूर्य को ही,गर्व से इतना तना  है
बरस कर फिर जल बनोगे,
गर्व को अपने संहारो
अरे ओ औलाद वालों!
बाल मन कोमल न जाने,क्या गलत है,क्या सही है
देखता जो बड़े करते,बाद में करता वही  है
इस तरह संस्कार पोषित कर रहे तुम बालमन के
बीज खुद ही बो रहे,अपने बुढ़ापे  की घुटन के
क्या गलत है,क्या सही है,
जरा अपना मन खंगालो
अरे ओ औलाद वालों!

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Tuesday, February 7, 2012

घुटने की तकलीफ

घुटने की  तकलीफ
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होती हमें बुढ़ापे में है ,घुटने की तकलीफ बहुत है
बचपन में चलते घुटनों  बल,चलना तभी सीख पाते है
मानव के जीवन में घुटने,सबसे अधिक काम आते है
करो प्रणाम,झुकाव घुटने,प्रभु पूजन में घुटने टेको
दफ्तर में साहब के आगे,झुकना पड़ता है घुटने को
बैठो तो घुटने बल बैठो,लेटो,करवट लो, घुटने बल
योगासन में,भागदौड़ में,घुटने ही देते है संबल
जगन,शयन और मधुर मिलन में,घुटने का सहयोग बहुत है
सीढ़ी चढ़ने  और उतरने   में घुटनो  का  योग बहुत  है
पत्नी जी यदि जिद पर आये,उनके आगे टेको  घुटने
हम इतना झुकते जीवन भर,की घुटने लगते है दुखने
इस शरीर का सारा बोझा,बेचारे घुटने सहते है
कदम कदम पर ,घुटनों के बल,हम आगे बढ़ते रहते है
एक  तो उमर बुढ़ापे की और उस पर ये घुटने की पीड़ा
उस पर बच्चे ध्यान न देते,मन ही मन घुटने की पीड़ा
मन की घुटन,दर्द घुटने का,तन मन रहती पीड़ बहुत है
होती हमें बुढ़ापे में है,घुटने की तकलीफ बहुत है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Friday, January 27, 2012

बूढों का हो कैसा बसंत

बूढों का हो कैसा बसंत?
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पीला रंग सरसों फूल गयी
मधु देना अब ऋतू भूल गयी
सब इच्छाएं प्रतिकूल गयी
        यौवन का जैसे हुआ अंत
        बूढों का हो कैसा बसंत
गलबाहें क्या हो,झुकी कमर
चल चितवन, धुंधली हुई नज़र
क्या रस विलास अब गयी उमर
         लग गया सभी पर प्रतिबन्ध
          बूढों का हो कैसा बसंत
था चहक रहा जो भरा नीड़
संग छोड़ गए सब,बसी पीड़
धुंधली यादें,मन है अधीर
          है सभी समस्यायें दुरंत
          बूढों का हो कैसा बसंत
मन यौवन सा मदहोश नहीं
बिजली भर दे वो जोश नहीं
संयम है पर संतोष नहीं
        मन है मलंग,तन हुआ संत
         बूढों का हो कैसा बसंत

मदन मोहन बाहेती'घोटू'



Thursday, January 19, 2012

गुल से गुलकंद

गुल से गुलकंद
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पहले थी तुम कली
मन को लगती भली
खिल कर फूल बनी
तुम खुशबू से सनी
महकाया  जीवन
हर पल और हर क्षण
पखुडी पखुडी खुली
मन में मिश्री  घुली
गुल,गुलकंद हुआ
उर आनंद   हुआ
असर  उमर का पड़ा
दिन दिन प्यार बढ़ा
कली,फूल,गुलकंद
हरदम रही   पसंद
खुशबू प्यार भरी
उम्र यूं ही गुजरी

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Thursday, January 12, 2012

जब जब दिल में दर्द हुआ है

जब जब दिल में दर्द हुआ है
तब तब मौसम सर्द हुआ है
जब भी कोई आपके अपने,
             जिनको आप प्यार करते है
मुंह पर मीठी मीठी बातें,
            पीछे पीठ वार   करते है
जब जब भी बेगानों जैसा,
अपना ही हमदर्द हुआ है
तब तब मौसम सर्द हुआ है
रिश्तों के इस नीलाम्बर में,
               कई बार छातें है बादल                                      
होती है कुछ बूंदा बांदी,
               पर फिर प्यार बरसता निश्छल
शिकवे गिले सभी धुल जाते,
मौसम खुल बेगर्द  हुआ है
जब जब दिल में दर्द हुआ है
गलतफहमियों का कोहरा जब,
                आसमान में छा जाता है
देता कुछ भी नहीं दिखाई ,
                रास्ता नज़र नहीं आता है
दूर क्षितिज में अपनेपन का,
सूरज जब भी जर्द हुआ है
तब तब मौसम सर्द हुआ है
शीत ग्रीष्म के ऋतू चक्र के,
                         बीच बसंत ऋतू आती है  
नफरत के पत्ते झड़ते है ,
                        प्रीत कोपलें मुस्काती है
कलियों और भ्रमरों का रिश्ता,
जब खुल कर बेपर्द  हुआ  है
तब तब दिल में दर्द हुआ है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Sunday, January 8, 2012

बेबसी

बेबसी
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तमन्ना है चाँद को जाकर छुए,खड़े  ढंग से मगर हो पाते नहीं
हुस्न की खिलती बहारें देख कर,छटपटाते,पर पटा पाते नहीं
खाने के तो हम बड़े शौक़ीन है,ठीक से पर अब पचा पाते नहीं
मन तो करता खिलखिला कर हम हँसे,होंठ खुल कर मगर मुस्काते नहीं
बढ़ गयी इतनी  खराशें गले में,ठीक से अब गुनगुना पाते नहीं
बांसुरी अब हो गयी है बेसुरी,सुर बराबर भी निकल पाते नहीं
यूं तो बादल घुमड़ते है जोर से,मगर बेबस से बरस पाते नहीं
उम्र ने एसा असर है कर दिया,चाह है पर कुछ भी कर पाते नहीं

मदन मोहन बाहेती'घोटू'