अबके सावन में
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इन होटों पर गीत न आये, अबके सावन में
बारिश में हम भीग न पाए,अबके सावन में
अबके बस पानी ही बरसा,थी कोरी बरसात
रिमझिम में सरगम होती थी,था जब तेरा साथ
व्रत का अमृत बरसाती थी,जो हम पर हर साल,
वो हरियाली तीज न आये,अबके सावन में
तुम्हारी प्यारी अलकों का,था मेघों सा रंग
तड़ित रेख सा,दन्त लड़ी का,मुस्काने का ढंग
घुमड़ घुमड़ कर काले बादल ,छाये कितनी बार
पर वो बादल रीत न पाये,अबके सावन में
पहली बार चुभी है तन पर,पानी की फुहार
जीवन के सावन में सूखे,है हम पहली बार
सूखा सूखा ,भीगा मौसम,सूनी सूनी शाम,
उचट उचट कर नींद न आये,अबके सावन में
मदन मोहन बहेती'घोटू'
Budhapa is the time wen u r supposed to rest on ur laurels;wen the younger generation whom u hv nurtured with so much luv and care tries to return back all that u hv done for them in whatever way they can.But its often a dreaded sentence;a phase wen younger ones grow out of their use of you & desert u;when poor health and ungrateful children unite forces to make life miserable.This blog of poems of Ghotoo reflect experiences of life in old age,in which u’ll find your own experience reflected
Friday, July 15, 2011
Tuesday, July 12, 2011
वेदनाये
वेदनाये
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दुखी मन की वेदनायें,आज पीछे पड़ गयी है
ह्रदय की संवेदनायें, आज पीछे पड़ गयी है
ओढ़ यादों की रजाई,मन बसंती ठिठुरता है
शूल जैसी चुभा करती ,स्वजनों की निठुरता है
जो कभी अपने सगे थे,पराये से हो गए है
प्यार के ,अपनत्व के सब,भाव क्यूं कर,खो गए है
मिलन की संभावनाएं,आज पीछे पड़ गयी है
दुखी मन की वेदनायें,आज पीछे पड़ गयी है
नींद क्यों जाती उचट अब ,रात के पिछले प्रहर है
भावना के ज्वार में क्यों,मन भटकता,इस कदर है
है बहुत चिंतित व्यथित मन,शांति मन की लुट रही है
घाव ताज़े या पुराने,टीस मन में उठ रही है
कसकती कुछ भावनाए,आज पीछे पड़ गयी है
ह्रदय की संवेदनाये, आज पीछे पड़ गयी है
हो रहा भारी बहुत मन ,ह्रदय में कुछ बोझ सा है
एक दिन की बात ना है,सिलसिला ये रोज का है
कई बाते पुरानी आ,द्वार दिल के खटखटाती
ह्रदय में आक्रोश भरता,भावनाएं छटपटाती
,व्यथित मन की यातनाएं,आज पीछे पड़ गयी है
दुखी दिल की वेदनाये, आज पीछे पड़ गयी है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
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दुखी मन की वेदनायें,आज पीछे पड़ गयी है
ह्रदय की संवेदनायें, आज पीछे पड़ गयी है
ओढ़ यादों की रजाई,मन बसंती ठिठुरता है
शूल जैसी चुभा करती ,स्वजनों की निठुरता है
जो कभी अपने सगे थे,पराये से हो गए है
प्यार के ,अपनत्व के सब,भाव क्यूं कर,खो गए है
मिलन की संभावनाएं,आज पीछे पड़ गयी है
दुखी मन की वेदनायें,आज पीछे पड़ गयी है
नींद क्यों जाती उचट अब ,रात के पिछले प्रहर है
भावना के ज्वार में क्यों,मन भटकता,इस कदर है
है बहुत चिंतित व्यथित मन,शांति मन की लुट रही है
घाव ताज़े या पुराने,टीस मन में उठ रही है
कसकती कुछ भावनाए,आज पीछे पड़ गयी है
ह्रदय की संवेदनाये, आज पीछे पड़ गयी है
हो रहा भारी बहुत मन ,ह्रदय में कुछ बोझ सा है
एक दिन की बात ना है,सिलसिला ये रोज का है
कई बाते पुरानी आ,द्वार दिल के खटखटाती
ह्रदय में आक्रोश भरता,भावनाएं छटपटाती
,व्यथित मन की यातनाएं,आज पीछे पड़ गयी है
दुखी दिल की वेदनाये, आज पीछे पड़ गयी है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
Thursday, July 7, 2011
संस्कार
संस्कार
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हमने जब बच्चे पाले
तो विनम्रता और आज्ञाकारी
होने के संस्कार डाले
हमें ख़ुशी है ,हमारा बेटा,
अभी भी संस्कारी है
हमारा नहीं तो क्या,
अपनी पत्नी का तो आज्ञाकारी है
घोटू
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हमने जब बच्चे पाले
तो विनम्रता और आज्ञाकारी
होने के संस्कार डाले
हमें ख़ुशी है ,हमारा बेटा,
अभी भी संस्कारी है
हमारा नहीं तो क्या,
अपनी पत्नी का तो आज्ञाकारी है
घोटू
जनरेशन गेप
जनरेशन गेप
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हमारे बच्चे,जब छोटे होते है
हमारी उंगली पकड़ कर खड़े होते है
पर अपने पेरों पर खड़े होने के बाद,
वे अपनी खिचड़ी अलग पकाते है
उनके विचार,हमारे विचारों से मेल नहीं खाते है
और कहते है की ये जनरेशन का अंतर है
पर ये बात हमारी समझ के बाहर है
क्योकि हमारी और उनकी उनकी ,
उम्र में तब भी था इतना ही अंतर
जब वो चलते थे हमारी उंगली पकड़ कर
घोटू
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हमारे बच्चे,जब छोटे होते है
हमारी उंगली पकड़ कर खड़े होते है
पर अपने पेरों पर खड़े होने के बाद,
वे अपनी खिचड़ी अलग पकाते है
उनके विचार,हमारे विचारों से मेल नहीं खाते है
और कहते है की ये जनरेशन का अंतर है
पर ये बात हमारी समझ के बाहर है
क्योकि हमारी और उनकी उनकी ,
उम्र में तब भी था इतना ही अंतर
जब वो चलते थे हमारी उंगली पकड़ कर
घोटू
भविष्यवाणी
भविष्यवाणी
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एक पेंसठ वर्षीय बुढ़िया ने,
एक ज्योतिषी को,
अपनी जन्म कुंडली दिखलाई
ज्योतिषी ने,काफी बातें सच बतलाई
बोला अटल सुहाग है,
काया निरोग है
पर माई,तेरा दो सासों का योग है
बुढ़िया बोली,तेरी ये बात है बेकार
मेरे ससुर तो गए है स्वर्ग सिधार
पास खड़ा बूढा पति बोला,
ज्योतिषी की बात में दम है
तेरी बहू, क्या सास से कम है?
घोटू
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एक पेंसठ वर्षीय बुढ़िया ने,
एक ज्योतिषी को,
अपनी जन्म कुंडली दिखलाई
ज्योतिषी ने,काफी बातें सच बतलाई
बोला अटल सुहाग है,
काया निरोग है
पर माई,तेरा दो सासों का योग है
बुढ़िया बोली,तेरी ये बात है बेकार
मेरे ससुर तो गए है स्वर्ग सिधार
पास खड़ा बूढा पति बोला,
ज्योतिषी की बात में दम है
तेरी बहू, क्या सास से कम है?
घोटू
Monday, June 13, 2011
मज़ा बुढ़ापे का
मज़ा बुढ़ापे का
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सीनियर सिटिज़न हैं,हुए रिटायर हम हैं,
मस्ती का आलम है,मौज हम मनाते हैं
नहीं कोई काम धाम,अब तो बस है आराम,
तीरथ और ग्राम ग्राम ,घूमते घुमाते हैं
आजकल निठल्ले हैं,एकदम अकेल्ले हैं,
पैसा जो पल्ले है,खरचते,उड़ाते है
कैसा भी हो मौसम,नहीं कोई चिंता गम,
मज़ा बुढ़ापे का हम,जम कर उठाते है
मदन मोहन बहेती 'घोटू'
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सीनियर सिटिज़न हैं,हुए रिटायर हम हैं,
मस्ती का आलम है,मौज हम मनाते हैं
नहीं कोई काम धाम,अब तो बस है आराम,
तीरथ और ग्राम ग्राम ,घूमते घुमाते हैं
आजकल निठल्ले हैं,एकदम अकेल्ले हैं,
पैसा जो पल्ले है,खरचते,उड़ाते है
कैसा भी हो मौसम,नहीं कोई चिंता गम,
मज़ा बुढ़ापे का हम,जम कर उठाते है
मदन मोहन बहेती 'घोटू'
Wednesday, June 1, 2011
मुझ को बूढा मत समझो तुम, मै जवान हूँ
मुझ को बूढा मत समझो तुम ,मै जवान हूँ
अस्ताचल की और झुक रहा आसमान हूँ
नहीं प्रखरता ,अब मुझमे स्वर्णिम आभा है
तेज घट गया और अब शीतलता ज्यादा है
भुवनभास्कर था मै,अब हूँ ढलता सूरज
पर सूरज ,सूरज था ,सदा रहेगा सूरज
जग को जीवन देने वाला ,महाप्राण हूँ
मुझ को बूढा मत समझो तुम, मै जवान हूँ
अस्ताचल की और झुक रहा आसमान हूँ
नहीं प्रखरता ,अब मुझमे स्वर्णिम आभा है
तेज घट गया और अब शीतलता ज्यादा है
भुवनभास्कर था मै,अब हूँ ढलता सूरज
पर सूरज ,सूरज था ,सदा रहेगा सूरज
जग को जीवन देने वाला ,महाप्राण हूँ
मुझ को बूढा मत समझो तुम, मै जवान हूँ
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